प्रेमानंद जी महाराज : भक्ति के समकालीन प्रतीक
प्रेमानंद जी महाराज राधा के प्रेम में डूबे एक आधुनिक संत है, इस आधुनिक युग में जहाँ भक्ति और आध्यात्मिकता अक्सर भौतिकवाद के आगे धूमिल होती दिखती है, प्रेमानंद जी महाराज (Premanand ji Maharaj) भारतीय संत परंपरा के एक जीवंत प्रकाशस्तंभ बनकर उभरे हैं। वृंदावन की पावन धरा पर स्थित उनका श्री हित राधा केली कुंज आश्रम आज लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। यहाँ से प्रसारित होने वाला उनका “एकान्तिक वार्तालाप” सत्संग मात्र यूट्यूब पर ही 500+ एपिसोड्स पार कर चुका है। उनके प्रवचनों में राधा-कृष्ण की लीलाओं का जो अद्भुत विवेचन मिलता है, वह भक्तों के हृदय में भक्ति की अखंड ज्योति प्रज्वलित कर देता है।
प्रारंभिक जीवन: बाल्यावस्था से ही प्रखर आध्यात्मिक प्रवृत्ति
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
- 30 मार्च 1969 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल ब्लॉक स्थित अखरी गाँव में जन्में अनिरुद्ध कुमार पांडेय (वर्तमान नाम: प्रेमानंद गोविंद शरण) का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।
- उनके पिता श्री शंभू पांडेय और माता श्रीमती रामा देवी दोनों ही अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उनके दादा एक संन्यासी थे, और बाद में पिता ने भी संन्यास ले लिया था।
बचपन से ही विशिष्ट रुझान
- मात्र पाँचवीं कक्षा में रहते हुए ही उन्होंने भगवद गीता और सुख सागर जैसे ग्रंथों का अध्ययन शुरू कर दिया था ।
- उनके मन में बाल्यावस्था से ही गहन प्रश्न उठते थे: “क्या माता-पिता का प्रेम स्थायी है? क्या स्कूली शिक्षा जीवन के वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचा सकती है?”।
आध्यात्मिक यात्रा: घर त्यागने से वृंदावन तक

1. 13 वर्ष की आयु में जीवन का निर्णायक मोड़
- जब अनिरुद्ध मात्र नौवीं कक्षा में थे, तभी उन्होंने आध्यात्मिक जीवन जीने का निश्चय कर लिया। 1982 में, सुबह तीन बजे वे बिना किसी को बताए घर से निकल गए।
- वाराणसी पहुँचकर उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली और नया नाम “आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी” धारण किया। बाद में “स्वामी आनंदाश्रम” नाम से जाने गए।
2. वृंदावन की ओर प्रस्थान
- काशी में भगवान शिव के दर्शन के बाद एक संत की प्रेरणा से वे मथुरा की ट्रेन से वृंदावन पहुँचे।
- यहाँ उनकी मुलाकात राधा वल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख संत श्री हित मोहित मराल गोस्वामी जी से हुई। बाद में वे श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज के शिष्य बन गए और दस वर्षों तक उनकी सेवा की।
दर्शन और शिक्षाएँ: जीवन को परिवर्तित करने वाले सूत्र
मूल सिद्धांत
- “प्रेम ही संसार का आधार है। बिना प्रेम के जीवन अधूरा है” 1।
- क्रोध पर नियंत्रण: “क्रोध से कभी किसी का मंगल नहीं हुआ, यह समस्त गुणों का नाश कर देता है”।
2. सतगुरु का महत्व
- गुरु को वे “आत्मा के जागरण का दीपक” मानते हैं। उनका कहना है कि “गुरु के बिना भक्ति अधूरी है” और गुरु-शिष्य का संबंध “आत्मिक बंधन” होता है।
3. साकार बनाम निराकार भक्ति
- उनके अनुसार परमात्मा सर्वव्यापी हैं। मूर्ति पूजा को वे ध्यान केंद्रित करने का माध्यम मानते हैं, न कि स्वयं ईश्वर 4।
- भक्ति में भावना की शुद्धता को सबसे महत्वपूर्ण बताते हैं: “चाहे साकार हो या निराकार, शुद्ध भाव से की गई उपासना कृपा प्राप्त कराती है”।
सामाजिक योगदान: भक्ति सेवा और समाज कल्याण
1. श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट
- 2016 में स्थापित इस ट्रस्ट के माध्यम से निःशुल्क भोजन, चिकित्सा सेवा, आवास और शिक्षा जैसी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।
- यह संस्था वृंदावन आने वाले तीर्थयात्रियों को निशुल्क सहायता प्रदान करती है।
2. युवाओं के लिए संदेश
- उन्होंने ब्रह्मचर्य पर एक पुस्तक लिखी है, जिसमें आधुनिक युवाओं के लिए इसके महत्व को रेखांकित किया गया है।
- उनका कहना है: “चरित्र निर्माण ही जीवन का आधार है। नकारात्मक चरित्र व्यक्ति और समाज दोनों के लिए घातक है।
3. व्यक्तिगत संघर्ष: बीमारी से जूझते हुए सेवा
35 वर्ष की आयु में उन्हें गंभीर किडनी रोग हो गया। डॉक्टरों ने कुछ वर्षों का ही जीवन बताया था, लेकिन उन्होंने भक्ति और साधना के बल पर इस चुनौती का सामना किया।
आज भी नियमित डायलिसिस कराने के बावजूद वे प्रतिदिन सत्संग एवं प्रवचन देते हैं। उनकी दिनचर्या में कोई व्यवधान नहीं आता।
प्रेमानंद महाराज जी के विचारों से जीवन को सँवारने के सूत्र

- मन की शांति: “मन को शांत करने के लिए सबसे पहले उसे प्रेम से भरना होता है” 1।
- क्षमा का महत्व: “दूसरों को माफ़ करना ही अपने मन को शांति देने का सबसे प्रभावी तरीका है” 1।
- वर्तमान में जीना: “अतीत और भविष्य केवल भ्रम हैं, वर्तमान में जीने से ही मानसिक शांति मिलती है”।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रेमानंद महाराज जी से कैसे मिल सकते हैं?
उनसे मिलने के लिए वृंदावन स्थित श्री हित राधा केली कुंज आश्रम जाना होगा। दर्शन हेतु 2-3 दिन रुकने की आवश्यकता हो सकती है।
उनके गुरु कौन हैं?
उनके गुरु श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज हैं, जो राधा वल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख संत हैं। महाराज जी आज भी उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हैं।
उनकी प्रमुख पुस्तकें कौन-सी हैं?
ब्रह्मचर्य, एकान्तिक वार्तालाप, हित सदगुरुदेव के वचनामृत, और अंग्रेजी में Spiritual Awakening।
क्या वे बीमारी के बावजूद सक्रिय हैं?
हाँ! किडनी रोग और नियमित डायलिसिस के बावजूद वे प्रतिदिन सत्संग व प्रवचन देते हैं।
उपसंहार : एक जीवंत आध्यात्मिक विरासत
प्रेमानंद महाराज जी आज के युग में भक्ति की अविरल धारा के प्रतीक बन गए हैं। उनका जीवन त्याग, साधना और सेवा का अनुपम उदाहरण है। चाहे वह 13 वर्ष की आयु में घर त्यागने का साहस हो या गंभीर बीमारी में भी करुणा का प्रवाह—उनकी प्रत्येक क्रिया मानवीय संभावनाओं का नया आयाम दिखाती है। उनकी वाणी में “राधे राधे” का जाप केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन को प्रेम और समर्पण से भर देने का आह्वान है। आधुनिक भारत की आध्यात्मिक चेतना में वे एक ऐसा सूर्य हैं जिसकी किरणें भक्ति के पथ को सदैव प्रकाशित करती रहेंगी।
“जो अपने भीतर शांति और प्रेम का अनुभव करता है, वही दुनिया में शांति ला सकता है” — प्रेमानंद महाराज जी






